धाखमक चढ़ावों के कीर्तिमान – अब जरूरी है सिसाधारण खाते में फंड कीर्तिमान

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Dated: March 2024 

देशभर में धाखमक आयोजनों की धूम मची हुई है। जगह-जगह उदारता से धन खर्च किया जा रहा है, और चढ़ावों में मानो एक होड़ लगी है। ध्वजा चढ़ाने की बोलियों ने, जिनालयों के अमर ध्वजारोहण ने, और प्रतिष्ठा कार्यक्रमों ने नए-नए कीर्तिमान स्थापित कर दिए हैं

रेवतड़ा मंदिर प्रतिष्ठा और प्राचीन श्री भाण्डवपुर तीर्थ प्रतिष्ठा जैसे आयोजनों में समर्पण और श्रद्धा का जो स्तर देखने को मिला, वह निश्चित ही अनुमोदनीय है। लोग दिल खोलकर चढ़ावे दे रहे हैं, धर्मशालाएँ बन रही हैं, भव्य आयोजन हो रहे हैं—यह हमारी धर्मभावना और समर्पण का प्रतीक है।


लेकिन अब जरूरी है – दूरदृष्टि और संतुलित योजना

इन आयोजनों की अनुमोदना करते हुए अब यह भी आवश्यक है कि हम वर्तमान और भविष्य के लिए दूरदर्शिता से ठोस कदम उठाएँ।
हमें यह सोचना होगा कि:

  • क्या केवल भव्य प्रतिष्ठा और चढ़ावे ही पर्याप्त हैं?
  • क्या धर्मस्थान की सुरक्षा, नियमित पूजा व्यवस्था और स्वधर्मी सहयोग के लिए भी हम उतने ही सजग हैं?

सिसाधारण खाते में बड़ा फंड: समय की मांग

धर्मस्थानों को केवल बनाना ही नहीं, उनकी दीर्घकालिक व्यवस्था भी आवश्यक है।
इसमें मुख्य रूप से ध्यान देना होगा:

  • पूजा करने वालों की संख्या बढ़े,
  • आर्थिक रूप से असमर्थ स्वधर्मियों को भी पूजा और सेवा का अवसर मिले,
  • तीर्थस्थलों पर जैन भाई-बहनों की नियुक्ति एवं व्यवस्थापन संभव हो।

इसके लिए अब समय आ गया है कि हम सिसाधारण खाते में एक बड़ा फंड तैयार करें।
यह फंड सिर्फ भवन निर्माण या आयोजन के लिए नहीं, बल्कि जैन धर्म के निरंतर संचालन, प्रचार और सुरक्षा के लिए हो।


समापन संदेश

धर्म की दीर्घकालिक रक्षा केवल आयोजनों से नहीं, व्यवस्था और दायित्व बोध से होती है
आइए, हम चढ़ावों के साथ-साथ संगठित सेवा, व्यवस्था, और सच्चे अर्थों में स्वधर्मी सहयोग की दिशा में भी ठोस पहल करें।

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